सिर्फ़ ज्ञान सुन लेना पर्याप्त नहीं—जीवन तब बदलता है जब उसे स्वीकार कर आचरण में उतारा जाए। श्रवण, मनन और दृढ़ निश्चय के माध्यम से ही श्रद्धा गहरी होती है, बुद्धि स्थिर होती है और साधक धीरे-धीरे भगवत्प्राप्ति की ओर बढ़ने लगता है।
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